Thursday, September 8, 2022

हमारे देश में आज भी ये परिवेश है, लाचारी है,बीमारी है, राग है द्वेष है, इसे कर्मो का बंधन कहें या कहें भाग्य का खेल गरीबी दुनिया का सबसे बड़ा क्लेश है! हमारे देश में आज भी ये परिवेश है!! बस बेबसी,और बेकसी में रहता है आदमी हाथों के छालों पैर की बेवाइयों को देखता है आदमी, उदासी है, मायूसी है, मगर जीवन शेष है, हमारे देश में आज भी ये परिवेश है!! रो पड़ेगा ये आंगन धरा ये गगन आह निकलेगी, खूं निकलेगा क्षुब्ध होगा मन, धोका है,फरेब है, मतलबी अशेष है, हमारे देश में आज भी ये परिवेश है!! अभिषेक मिश्रा

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